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पटना के महावीर मंदिर पर अयोध्या के हनुमान गढ़ी ने ठोका दावा, आचार्य किशोर कुणाल ने सिरे से नकारा

हनुमान गढ़ी ने बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् को पत्र लिखकर महावीर मंदिर पर जताया अधिकार

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महावीर मंदिर पटना की बढ़ती ख्याति के बीच हनुमानगढ़ी ने स्वामित्व का दावा किया

राज्य धार्मिक न्यास परिषद के समक्ष किये गए दावे के विरोध में कुणाल ने दिये अकाट्य तर्क

पटना (voice4bihar desk)। पटना जंक्शन के पास स्थित महावीर मंदिर के वैभव व बढ़ती ख्याति को देखते हुए अयोध्या के हनुमान गढ़ी ने इस मंदिर पर स्वामित्व का दावा कर विवाद को जन्म दे दिया है। हालांकि इस दावे को आचार्य किशोर कुणाल ने अकाट्य तर्कों के साथ खारिज कर दिया है। पटना महावीर मंदिर के प्रमुख कर्ता-धर्ता श्री कुणाल ने कहा है कि पटना का महावीर मंदिर हनुमानगढ़ी से स्वतंत्र एक पृथक धार्मिक संस्था है, जो बिहार हिन्दू धार्मिक न्यास अधिनियम के तहत धार्मिक न्यास पर्षद् के अधीन कार्यरत है। अयोध्या के हनुमान गढ़ी से इसका कोई वास्ता नहीं ऐतिहासिक जुड़ाव नहीं रहा है।

 महावीर मंदिर की ओर से अयोध्या में संचालित  ‘राम-रसोई’ की रास्ट्रीय स्तर पर चर्चा 

बता दें कि उत्तर प्रदेश स्थित अयोध्या के हनुमान गढ़ी ने बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् को पत्र लिखकर महावीर मन्दिर, पटना पर अपना अधिकार जताने के लिए दावा प्रस्तुत किया है। यह दावा ऐसे वक्त में किया गया है, जब महावीर मंदिर की ख्याति देश स्तर पर तेजी से बढ़ी है। महावीर मंदिर पटना की ओर से अयोध्या में संचालित ‘राम-रसोई’ इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हो रहा है। साथ ही महावीर मंदिर की ओर से रामजन्म-भूमि मंदिर को प्रति वर्ष दो करोड़ रुपये का सहयोग दिया जा रहा है। इसके अलावा बिहार के चंपारण जिला अंतर्गत केसरिया के पास जानकी नगर में 270 फीट ऊंचे विराट रामायण मंदिर का निर्माण जारी है।

पटना में पांच बड़े अस्पतालों का संचालन करता है यह मंदिर

पटना के महावीर मंदिर की ख्याति धार्मिक क्रियाकलापों के साथ सामाजिक कार्यों की वजह से भी बढ़ी है। बिहार की राजधानी पटना में महावीर कैंसर संस्थान, महावीर वात्सल्य अस्पताल व महावीर नेत्रालय जैसे पांच विशाल अस्पतालों का संचालन महावीर मंदिर करता रहा है, जहां आम रोगियों का सस्ते दर पर इलाज किया जाता है। जाहिर है कि मंदिर की ख्याति व वैभव को देखते हुए इस पर स्वामित्व का दावा किया गया हो।  बताया जाता है कि पटना के महावीर मंदिर पर अपना दावा पुख्ता करने के लिए अयोध्या में हनुमान गढ़ी की ओर से हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया है।

दोनों पक्षों के दावे-प्रतिदावे के बाद विवाद बढ़ने की पूरी गुंजाइश

आचार्य किशोर कुणाल महावीर का इतिहास एवं इसकी कानूनी स्थिति की जानकारी हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीन महंत श्री प्रेम दास एवं बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् के अध्यक्ष को पहले ही दे चुके हैं। इसके बाद भी हनुमान गढ़ी की ओर से जनसमर्थन जुटाने के लिए अयोध्या में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया है। इसका जवाब देने के लिए महावीर मंदिर ने भी पूरी तैयारी कर ली है। अब चूंकि हनुमानगढ़ी ने बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् के पास अपना दावा प्रस्तुत किया है, इसलिए महावीर मंदिर के इतिहास एवं कानूनी स्थिति से जनता एवं भक्तों को अवगत कराने के लिए श्री कुणाल ने इस संबंध में एक विज्ञप्ति जारी की है।

आचार्य किशोर कुणाल।

किशाेर कुणाल ने बताया महावीर मंदिर का इतिहास

15 अप्रैल, 1948 को पटना उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया था। इसमें इस मंदिर के इतिहास का भी उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि 1900 ई. में अलखिया बाबा ने पटना नगरपालिका से मंदिर की चारदीवारी बनाने की अनुमति मांगी थी। अलखिया बाबा गोसाईं थे। उनका असली नाम भेख नारायण था। उनके पिता का नाम गणेश गोसाईं और भाई का नाम शिव चरण था। उनके पुत्र का नाम झूलन गिर था। इनमें से किसी का सम्बन्ध हनुमानगढ़ी से नहीं था।

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अलखिया बाबा 1900 ई. के बहुत पहले से इस मंदिर में थे। 1923 ई. में उनका देहांत हो गया था। उनके देहांत के बाद उनके पुत्र झूलन गिर गद्दीनशीं हुए। उनकी उम्र कम थी इसलिए उनकी माता मोसमात बिसनुदेई कुंअर मंदिर की देखभाल करती थीं। झूलन गिर ने 1938 ई में महावीर दास को पुजारी नियुक्त किया। महावीर दास के मरने के बाद झूलन गिर ने सुंदर दास उर्फ राम सुंदर दास को पुजारी नियुक्त किया। ये दोनों स्थानीय साधु थे।

न्यायालय में जो मुकदमा चला उसमें एक ओर झूलन गिर और उनकी मां मोसमात बिसनुदेई कुंअर थे और दूसरी ओर राम सुंदर दास तथा जन प्रतिनिधि थे। राम सुंदर दास ने अदालत में सर्वदा अपने को महावीर मंदिर का पुजारी लिखा है। इस संबंध में आये 15 पृष्ठों के लम्बे फैसले में कहीं भी अयोध्या या हनुमानगढ़ी की चर्चा या संकेत भी नहीं है।

अलखिया बाबा और उनके उत्तराधिकारी महावीर मंदिर को अपना निजी मंदिर मानते थे। उनका दावा था कि रेलवे की ओर से जमीन उन्हें मिली थी और मन्दिर उन्होंने बनाया था। उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जमीन भले ही अलखिया बाबा को मिली हो, किन्तु वह मंदिर बनाने के लिए दी गयी थी और मंदिर भले ही उन्होंने बनवाया हो, किन्तु यह सबके लिए था। अतः यह उनका निजी मंदिर नहीं था।

पटना उच्च न्यायालय ने 15 अप्रैल, 1948 को इसे सार्वजनिक मंदिर घोषित किया। इस निर्णय में सुंदर दास उर्फ राम सुंदर दास की हैसियत महावीर मंदिर में पुजारी की थी और उच्च न्यायालय ने उन्हें पुजारी का दर्जा ही दिया। इस तथ्य को अपने फैसले में बार-बार लिखा भी गया है।

महावीर मंदिर में पुजारी के रूप में राम सुंदर दास करीब 1955 ई. तक रहे। उस साल शायद उनका स्वर्गवास हो गया। उसी के आस-पास श्री भगवान दास आये और राम सुंदर दास के स्थान पर बैठे। चूंकि राम सुंदर दास महावीर मंदिर में पुजारी थे अतः उनके स्थान पर आये महात्मा का दर्जा पुजारी का ही था। श्री भगवान दास मूलतः नेपाल के निवासी थे। वे अयोध्या होकर आये थे। किन्तु एक बार जब वे पटना आये उसके बाद अयोध्या से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। उनके समय में भी मंदिर का संचालन न्यास समिति के ही जिम्मे था।

मंदिर के पुजारी श्री राम गोपल दास को सन् 1987 ई. में वैशाली पुलिस हत्या एवं अन्य अपराधों में गिरफ्तार कर ले गयी और वे काफी दिन जेल में रहे। इस बीच बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद् ने महावीर मंदिर के सुचारु संचालन के लिए पुरानी न्यास समिति को भंग करते हुए 20 अक्टूबर, 1987 को एक नयी न्यास समिति का गठन किया।

वर्तमान में महावीर मंदिर की कानूनी स्थिति

महावीर मंदिर, पटना उच्च न्यायालय के आदेश से सार्वजनिक मंदिर है। 1935 ई. से इसका संचालन न्यास समिति द्वारा होता आ रहा है। 1956 ई. में धार्मिक न्यास पर्षद् और महावीर मंदिर न्यास समिति के बीच समझौता हुआ था। इसके अनुसार न्यास समिति जब तक मंदिर का आर्थिक विकास करती रहेगी, न्यास पर्षद् इसके संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेगी। 1958 ई. में पटना उच्च न्यायालय ने इस समझौते को स्वीकृति दी थी। 1990 ई. में धार्मिक न्यास पर्षद् ने इसके सुचारु संचालन के लिए एक विस्तृत योजना बनायी थी। इसके अनुरूप इी इसका संचालन होता है।

इस स्कीम के विरुद्ध श्री राम गोपाल दास ने पटना हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। दोनों अदालतों में उनकी हार हुई और निरूपित योजना कायम रही। न्यायालय के किसी आदेश या किसी भी दस्तावेज में हनुमानगद्दी की चर्चा नहीं है। मैं ही हनुमान गढ़ी से पुजारियों को मंगाकर महावीर मंदिर को हनुमान गढ़ी से बराबरी के स्तर पर जोड़ने की चेष्टा कर रहा था। इसके पहले 1987 से 1996 तक कांची मठ के शैव पुजारी नारायण भट्ट, सूर्य नारायण भट्ट और रवीन्द्र भट्ट इस मंदिर के पुजारी थे।

हनुमानगढ़ी के साधुओं की स्थिति

हनुमानगढ़ी से साधु के नाम पर जो पुजारी आये उनमें से 8 में से 7 एक ही परिवार के थे। उमा शंकर दास, रामा शंकर दास (चोरी के पचास हजार के साथ पकड़ा गया था) और मुरारी दास ये तीनों सगे भाई मंदिरर में पुजारी थे। अन्य रिश्तेदारों में मनीष दास इनका भगीना हैं। श्याम दास बुआ का लड़का हैं। दीपक दास भाभी का बहन का लड़का हैं। श्रीकांत दास पट्टीदार हैं। उमा शंकर दास के विरुद्ध अनेक शिकायतें मिलने के कारण उन्हें हटा दिया गया है।

श्री कुणाल लिखते हैं कि जून, 1993 में उनके अनुरोध पर गुरु रविदास मंदिर, अयोध्या ने दलित पुजारी फलहारी सूर्यंवंशी दास को यहां भेजा था। 13 जून, 1993 को उनकी नियुक्ति धूम-धाम से की गयी थी। पर बाद में उनके विरुद्ध अनेक शिकायतें मिलने पर गुरु रविदास मंदिर अयोध्या ने उन्हें महावीर मंदिर के पुजारी पद से हटा दिया है। उस आदेश के अनुसार आचार्य अवधेश दास को महावीर मंदिर, पटना में नये दलित पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया है। ये सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संस्कृत में आचार्य हैं। ये निष्ठावान् ब्रह्मचारी साधु हैं। उन्होंने महावीर मन्दिर में सेवा आरंभ कर दी है।

रामानंद सम्प्रदाय के 500 साल के इतिहास में पहली बार रामावत संगत का सम्मेलन 11-10-2014 को श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, पटना में हुआ। इसमें रामानंदाचार्य के सभी द्वादश शिष्यों के आश्रम से धर्माचार्य/प्रतिनिधि उपस्थित हुए और यह घोषणा हुई कि रामानंदाचार्य द्वारा स्थापित संस्था का नाम रामावत संगत था जिमसें अनंताचार्य जी कबीर पंथ, रविदास पंथ, सेन नाईं, धन्ना जाट आदि सभी पंथों के धर्माचार्य उपस्थित थे। महावीर मंदिर उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। यह हनुमानगढ़ी से स्वतन्त्र पृथक धार्मिक संस्था है, जो बिहार हिन्दू धार्मिक न्यास अधिनियम के तहत धार्मिक न्यास पर्षद् के अधीन कार्यरत है।

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