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भगवान नारायण की पूजा कर ली तो सातों लोक की अराधना कर ली

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आरा (voice4bihar desk)। जगदीशपुर के यज्ञ स्थल पर प्रवचन करते हुए जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि सुकदेव जी महाराज ने बताया कि मंगलाचरण का मतलब होता है मंगल करना। जैसे की किसी का विवाह हो रहा हो उसकी भूत, भविष्य, वर्तमान की कामना करना ही मंगलाचरण है। इसके लिए पितरों को गीत गाकर, ऋषियों, देवताओं को गोहराना ही मंगलाचरण होता है। इसी प्रकार श्री शुकदेवजी ने भी बाद में मंगलाचरण किया कि जो मै कह रहा हूं। इससे समाज में परिवार में जो सुनने वाला हो उसका मंगल हो। इसीलिए मंगलाचरण किया जाता है। चाहे भजन के रूप में हो या स्तुति के रूप में हो।

शुकदेवजी ने परिक्षित को बताया कि जो अच्छे सदाचारी ब्राम्हण हों उसे भगवान का मुख बताया गया है। भगवान के मुख की पूजा करने का मतलब अग्नि का पूजन, रोम की पूजा का मतलब वृक्ष की पूजा है। स्वास भगवान का वायु है। भगवान के नेत्र के ध्यान का मतलब अंतरिक्ष का ध्यान कर लिया। उनकी पलकों के ध्यान का मतलब उनकी पलकों का ध्यान करना है। भगवान के पैर के तलवे को ध्यान करते हुए मानना चाहिए कि यह पताल लोक है।

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पैर का अग्र भाग रसातल लोक, दोनों एडी के ध्यान का मतलब महातल का दर्शन, जांघो के ध्यान का मतलब महीतल लोक का दर्शन है। दोनो पेंडुली का दर्शन परासर लोक की पूजा, घुटनों का दर्शन सुतल लोक का दर्शन, नाभी का दर्शन करने का मतलब हमने आकाश और भगवान के वक्षस्थल का पूजा करने का मतलब स्वर्गलोक का दर्शन कर लिया। मुख के दर्शन करने का मतलब जन लोक, ललाट का दर्शन करने का मतलब तपोलोक का दर्शन, सिरोभाग का दर्शन सत् लोक है।

भगवान की भुजा की पूजा करने का मतलब इन्द्र की, कान का ध्यान करने का मतलब दिशा का पूजन, इस प्रकार भगवान के अंगो का ध्यान करने से अलग अलग लोकों के परिक्रमा करने का फल प्राप्त होता है। यदि सारी दुनिया के तीर्थ व्रत देवी देवता की पूजा करने की क्षमता नहीं है तो केवल एक मात्र भगवान नारायण की पूजा कर लिया तो तैंतीस कोटि देवता हैं सभी देवताओं को सातों लोक की अराधना कर लिया।

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