Header 300×250 Mobile

रेंजर हत्याकांड में हार्डकोर नक्सली गिरफ्तार, 21 वर्षों से फरार था नक्सली राजेंद्र चेरो

वर्ष 2000 में हुई थी रेंजर वीर बहादुर राम की हत्या, टुकड़ों में मिला था शव

- Sponsored -

576

- Sponsored -

- sponsored -

एसपी को मिले इनपुट के आधार पर कार्रवाई, अपने गांव में ही छुपा था राजेंद्र चेरो

रोहतास से अभिषेक कुमार के साथ बजरंगी कुमार सुमन की रिपोर्ट

voice4bihar news. रोहतास जिले के नक्सल प्रभावित इलाकों में लगातार छापेमारी के क्रम में पुलिस को बड़ी सफलता मिली है। वन विभाग के रेंजर की हत्या के आरोपी माधा गांव निवासी राजेंद्र चेरों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। राजेंद्र चेरों पिछले 21 वर्षों से फरार बताया जा रहा है। गिरफ्तार हार्डकोर नक्सली पर रोहतास रेंज के तत्कालीन रेंजर वीर बहादुर राम की हत्या में शामिल रहने का आरोप है।

रोहतास थाना क्षेत्र में हुई हत्या के मामले में धारा 147, 148, 149, 342, 323, 379, 302 सहित 27 आर्म्स एक्ट एवं 17 सीएलए एक्ट के तहत केस दर्ज हुआ था। 21 वर्ष पहले दर्ज थाना कांड संख्या 146/ 2000 के आलोक में गिरफ्तार राजेंद्र चेरो के बारे पुलिस कप्तान आशीष भारती को इनपुट मिला था। इसके तहत माधा गांव में ही राजेंद्र चेरो के होने की सूचना पुष्ट होने पर रोहतास पुलिस ने कार्रवाई करते हुए धर दबोचा है।

नक्सलियों ने रेंजर को गोली मारने के बाद टुकड़ों में काट दिया था शव

वर्ष 2000 के नवम्बर महीने में नक्सलियों ने रेंज ऑफिसर वीर बहादुर राम की गोली मार हत्या कर दी थी। इसके बाद गर्दन और पैर काट कर धड़ से अलग कर दिया तथा लाश के टुकड़ों को रोहतास रेंज ऑफिस के करीब कामदह नदी के पास फेंक दिया था। स्थिति देखकर लग रहा था कि वन विभाग के पदाधिकारियों और कर्मियों में दहशत फैलाने की नीयत से नृशंस हत्या की गयी थी।

जंगल में वर्चस्व को लेकर किसी हद तक जाने को आतुर थे नक्सली

उन दिनों वनकर्मियों की पिटायी, ग्रामीणों व वनवासियों पर पुलिस मुखबिरी का आरोप लगाकर मारपीट व हत्या की बात इलाके में नक्सलियों के लिए आम बात थी। रेंजर वीर बहादुर राम की हत्या के समय सीपी खंडूजा तत्कालीन जिला वन अधिकारी (DFO) हुआ करते थे। इस घटना के तुरंत बाद सीपी खंडूजा का स्थानांतरण हुआ और रेंजर की हत्या के ठीक एक माह बाद चर्चित अफसर संजय सिंह की पोस्टिंग बतौर डीएफओ रोहतास में हुई थी।

रेंजर की हत्या के बाद दहशत में आ गए थे वनरक्षी

विज्ञापन

रेंजर की हत्या के बाद रोहतास बीट एरिया के वनरक्षी गणेश पांडे को भी नक्सलियों ने पकड़ कर पीटा था। इस घटना से सभी वन कर्मी और पदाधिकारी भयभीत रहा करते थे, लेकिन तत्कालीन DFO संजय सिंह वनवासियों से मुलाकात होने पर एकजुट होकर मुकाबला करने का आह्वान करते हुए हौसला बढ़ाते थे। वे वन संपदा सहित वनकर्मियों की सुरक्षा के लिए एकजुट रहने की सलाह दिया करते थे।

इसके अलावे वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को तेंदूपत्ता की तस्करी पेड़ों की कटाई, अवैध खनन पर रोक लगाने, ड्यूटी पर मुस्तैद खड़े रहने तथा वर्दी पहनने का निर्देश दिया करते थे। यहां तक कि बंजारी सीमेंट फैक्टरी के लिए सप्लाई किये जाने को लेकर होने वाले अवैध खनन पर भी DFO संजय सिंह ने पदभार ग्रहण करने के साथ ही लगाम कसना शुरू कर दिया था।

निराला, राणा, तेगवा, बैठा, सुदामा, मुन्ना और संदेश का था आतंक

नक्सलवाद की जद में जकड़ चुकी कैमूरांचल घाटी में वर्ष 1995 से लेकर लगभग वर्ष 2015 तक लगभग दो दशक तक नक्सलियों की समानान्तर हुकूमत कायम रही। तत्कालीन सशस्त्र नक्सली दस्ते में नक्सली कमांडर निराला यादव उर्फ दीपक ऊर्फ रामराज यादव, वीरेंद्र यादव उर्फ राणा यादव, राम बचन यादव, तेगबहादुर यादव उर्फ तेगवा, अवधेश यादव, नीतीश उर्फ बीरबल, सुदामा उरांव ऊर्फ इनरजीत, प्रकाश उरांव, निर्मल उरांव उर्फ रामजी, सुदर्शन भूईयां, मनोज भूईयां, शम्मू उर्फ गुप्ता, विनय उर्फ सहदेव, सुनील पासवान, नवीन, सुनील, रामबली खरवार, ललन खरवार, निर्मल खरवार उर्फ अवधेश,नखरू खरवार उर्फ रामेश्वर, श्रीनिवास उर्फ संजीव, राजेन्द्र सिंह खरवार, छोटेलाल चेरो, फुलेन्द्र, रमेश कहार, शंकर राम उर्फ रौशन, चंदन बैठा, कामेश्वर बैठा, मुन्ना विश्वकर्मा, अनिल कुशवाहा उर्फ रितेश उर्फ संदेश सहित कई हार्डकोर नक्सली सक्रिय थे।

इनके अलावे गीता, पूनम, गीता, किरण, उत्तर प्रदेश चंदौली चकिया निवासी सुमित्रा उर्फ विनीता उर्फ प्रियंका उर्फ शशिबाला और सिन्टू नाम की महिला नक्सली भी शामिल थीं। दर्जन भर शीर्ष नक्सलियों के अलावे इलाके के सैकड़ों भटके नौजवान दस्ते में सक्रिय थे। जंगलों की तराई के अलावे जिला मुख्यालय सासाराम और पुलिस मुख्यालय डेहरी तक नक्सली कमांडर गतिविधियों को कायम रखते थे।

डीएफओ संजय सिंह की हत्या के बाद उखड़ने लगे नक्सलियों के पांव

15 फरवरी 2002 को तत्कालीन डीएफओ रहे संजय सिंह की हत्या ने नक्सलवाद और सरकारी व्यवस्था को आमने-सामने आ खड़ा किया। राज्य के अलावा देश भर में इसकी गूंज सुनाई दी और राजनीतिक संरक्षण के आरोप भी लगे। मामले ने तूल पकड़ा तो हत्याकांड की जांच का जिम्मा सरकार ने सीबीआई को सौंप दिया। जिसके बाद नीतीश उर्फ बीरबल यादव, प्रियंका उर्फ विनीता कुमारी और राम बचन यादव की गिरफ्तारी 2005 में हुई। वर्ष 2006 में कमांडर निराला यादव की भी गिरफ्तारी हुई।

नक्सलवाद की जड़ें खोदने में कई आईपीएस की रही अहम भूमिका

अब रोहतास जिले में पुलिस की कमान संभालने के लिए तेज-तर्रार आईपीएस अफसरों को भेजा जाने लगा। इसी क्रम में कामेश्वर बैठा, शंकर राम उर्फ रौशन जैसे शीर्ष नक्सली भी दबोचे गये और जुलाई 2011 में हार्डकोर नक्सली कमांडर वीरेन्द्र राणा और बिशुनदेव भी नक्सल वार में मारे गए। इसके बाद इलाके में नक्सलवाद की जड़े खोखली हुई जिसमें पुलिस कप्तान के रूप में बच्चू सिंह मीणा, नैय्यर हसनैन खान, विकास वैभव, जितेन्द्र सिंह गंगवार, मनु महाराज जैसे सुपर कॉप आईपीएस की भूमिका अहम रही है।

- Sponsored -

- Sponsored -

- Sponsored -

ADVERTISMENT