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“वैक्सीन डिप्लोमेसी” में चूक के कारण भारत में बेकाबू हुआ कोरोना संक्रमण

वैक्सीन संकट : विश्व गुरु की चाहत में अपनों को भूल गया देश का शीर्ष नेतृत्व

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आकिल हुसैन (वरिष्ठ पत्रकार)
aaquilhussain2013@gmail.com

Voice4biharnews. 1 मई से पूरे देश में 18 से 44 वर्ष तक के व्यक्तियों के वैक्सीनेशन का ऐलान हुआ तो देशवासियों में खुशी की लहर दौड़ गयी, परंतु ऐन वक्त पर वैक्सीन की कमी के कारण वैक्सीनेशन पर शुरू नहीं होने से बिहार समेत पूरे देश में मायूसी छा गयी। कोरोना वैक्सीन का वायल पर्याप्त मात्रा में नहीं होने के कारण कई राज्यों को वैक्सीनेशन अभियान बंद करना पड़ा या आगे के लिए टालना पड़ा। अब सवाल उठता है कि जिस भारत ने अपनी “वैक्सीन डिप्लोमेसी” के माध्यम से विश्व पटल पर धाक जमाई, वह अपने लोगों को वैक्सीन मुहैया कराने में इतना असहाय क्यों हो गया?

गुजरात, महाराष्ट्र व छत्तीसगढ़ ने 18-44 आयु वर्ग के लिए टीकाकरण तब तक के लिए टाल दिया है, जब तक वैक्सीन की मात्रा उपलब्ध न हो जाए। जम्मू कश्मीर, पंजाब, दिल्ली व पश्चिम बंगाल ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वैक्सीन डोज की कमी के कारण टीकाकरण शुरू नहीं हो सका है। भाजपा शासित गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने भी कह दिया है कि अभी तक राज्य को पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन नहीं मिला है, जिसके कारण 18-44 आयु वर्ग के लिए टीकाकरण की तिथि बाद में घोषित की जाएगी।

करीब 100 देशों को वैक्सीन देने वाले भारत के पास खुद के नागरिकों के लिए कम पड़ा डोज

विशेषज्ञों का कहना है कि सभी राज्यों को वैक्सीन उपलब्ध कराने में कम से कम तीन महीने और लगेंगे। करीब 100 देशों को वैक्सीन भेजकर विश्व गुरु बनने की आकांक्षा रखने वाले देश के नेतृत्वकर्ताओं ने आपदा के दौर में अपने ही लोगों की उपेक्षा क्यों की? विश्वमहामारी कोविड-19 से भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया प्रभावित है। हर देश अपने नागरिक की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिका जैसा सुपर पावर देश पहले अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति चिंचित बना हुआ है। परंतु भारत अपने देश के लोगों की सुरक्षा के प्रति चिंचित नहीं देख रहा है। अगर अपने देश के नागरिकों की सुरक्षा के प्रति चिंचित रहता तो वह पहले अपने नागरिकों का वैक्सीनेशन करवाता। उसके बाद ही दूसरे देशों की वैक्सीन से मदद के लिए सोचता!

आज आलम यह है कि भारत विश्व के सबसे अधिक वैक्सीन उत्पादन करने वाले देश में अब वैक्सीन की कमी महसूस होने लगी है। कई राज्यों ने केन्द्र सरकार को पत्र भेजकर वैक्सीन की कमी बताया है। यहां तक कि ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन को पत्र लिख कर कहा है कि राज्य में वैक्सीन डोज की कमी है। वैक्सीन की कमी के कारण करीब सात सौ टीकाकरण केन्द्र को बंद कराना पड़ा है।

अपनों की उपेक्षा की जाए, यह कैसी वैक्सीन डिप्लोमेसी?

पिछले वर्ष ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका दुनिया में कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देश था। वहां कोरोना संक्रमण के लाखों मामले आ रहे थे तथा बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो रही थी। ऐसे में जब हाइड्रोक्सीक्लोरोक्विन की मांग बढ़ी तब भारत ने अमेरिका को यह दवा भेजी थी। तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शुक्रिया अदा किया था और बदले में पीएम मोदी ने भी लिखा था कि महामारी के समय में भारत-अमेरिका के रिश्ते और मजबूत हुए हैं।

यह डिप्लोमेसी तो ठीक रही, परंतु भारत में नोवावैक्स और एस्ट्राजेनेका का उत्पादन करने वाले सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने जब हाल ही में कच्चे माल की कमी को लेकर चिंता जाहिर की, तो अमेरिका ने हाथ खड़े कर दिये। सीरम इंस्टीट्यूट के प्रमुख आदार पूनावाला ने अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों के चलते वैक्सीन निर्माण में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक बैग और फिल्टर की कमी होने की आशंका जताई लेकिन वैक्सीन और दवाओं से जुड़े कच्चे माल के आयात पर लगी रोक हटाने से अमेरिका ने इनकार कर दिया।

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भारत की मदद करने की बारी आई तो कहा – “अमेरिका फर्स्ट”

इतना ही नहीं व्हाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी ने कहा कि “अमेरिका फर्स्ट” यानी अमेरिका पहले अपने नागरिकों की जरूरतें पूरी करेगा। इस बयान के बाद पीएम मोदी और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट एक बार फिर सोशल मीडिया में सर्कुलेट होने लगे। तथा भारतीय लिखने लगे कि वो कैसे ट्रंप को ‘याद’ कर रहे थे! आम लोग यह पूछने लगे कि जब अमेरिका महामारी के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा था तब भारत ने उसकी मदद की थी तो अब अमेरिका अपने हाथ पीछे क्यों खींच रहा है? उसके बाद अमेरिका के अलग-अलग तबके से ये मांग उठने लगी कि अमेरिका को भारत की मदद करनी चाहिए। अमेरिका के कई सांसदों और बड़ी हस्तियों ने भी इसके लिए अपील की।

विदेश मंत्री को मांगनी पड़ी अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद

इतना ही नहीं भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय मदद की अपील की। तब जाकर अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने एक ट्वीट कर कहा कि अमेरिका भारत को अतिरिक्त मदद भेजेगा। फिर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अपने ट्विटर पर जारी बयान में कहा है कि पिछले वर्ष भारत ने अमेरिका की मदद की थी। अब हमारी बारी है कि हम भारत की हर संभव मदद करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि भारत को वैक्सीन और दवाएं बनाने में हर कच्चे माल की सप्लाई करेगा। वहीं दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की टेलीफोन पर बात हुई। जिसके बाद एयर इंडिया का एक विमान न्यूयार्क एयरपोर्ट से 318 ऑक्सीजन लेकर भारत आया।

देर से ही सही, कई देशों ने मदद के लिए बढ़ाये हाथ

भारत में कोरोना से बेकाबू होते हालात के बीच राहत वाली बात यह है कि देर से ही सही अब अमेरिका के अलावा दुनियाभर से भी भारत को मदद मिलनी शुरू हो गई है। सबसे पहले सिंगापुर से इंडियन एयरफोर्स के खास हेलीकॉप्टर से चार क्रायोजेनिक टैंकर समेत 250 ऑक्सीजन लाए गए। संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री ने भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से बात की तथा ऑक्सीजन के सात खाली टैंकर भारत भेजे। भारत के साथ खड़े होने के संदेश के रूप में दुबई के बुर्ज खलीफा को तिरंगे में दिखाया गया। सिंगापुर ने मेडिकल ऑक्सीजन भेजा। फिर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों का मदद के लिए आगे आए।

ब्रिटेन ने ऑक्सीजन सहित 600 मेडिकल उपकरण भेजने की घोषणा की। जिसमें 120 वेंटिलेटर भी शामिल हैं। हांग कांग से 800 ऑक्सीजन मंगाए गए हैं। सऊदी अरब ने 80 मीट्रिक टन ऑक्सीजन भेजा। रूस ने रेडमेसिविर और दूसरी मदद देने की बात कही है। जर्मनी से 23 मोबाइल ऑक्सीजन प्लांट लाए जा रहे हैं। फ्रांस, यूरोपियन यूनियन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने भी मदद के हाथ बढ़ाए हैं।
वहीं पीएम मोदी ने जापान के पीएम ने बात की। जापान ने संकट की इस घड़ी में भारत को हरसंभव मदद का भरोसा दिया। गूगल एवं माइक्रोसॉफ्ट के प्रमुख भारतीय मूल के सुंदर पिचाई और सत्या नडेला ने भी भारत को मदद देने का ऐलान किया है। यहां तक कि भारत के परंपरागत दुश्मन देश पाकिस्तान ने भी मुसीबत की घड़ी में मदद की पेशकश की है।

यह भी पढ़ें : दुनिया के सबसे बड़े ऑक्सीजन उत्पादक देश में ऑक्सीजन के बिना थम रहीं सांसें

चुनाव में व्यस्त रही सरकार, बेकाबू होते गए हालात

कोरोना संक्रमण रोकने में हमारी अपनी कमी भी कम जिम्मेदार नहीं रही। केन्द्र सरकार को अपने नागरिकों की चिंता करीब एक महीने तक नहीं रही और हम पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी राज्यों के विधान सभा चुनाव में व्यस्त रहे। जब कोरोना महामारी ने भयानक रूप ले लिया तथा देश में कोरोना के मामले लगातार बढ़ते गए और अस्पतालों में ऑक्सीजन के अभाव में मौतों की संख्या बढ़ने लगी। सरकारों की नाकामी के बाद राज्यों की उच्च न्यायालयों एवं सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेना शुरू कर दिया।

यहां तक कि मद्रास उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि अगर कोरोना की दूसरी लहर के लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहराया जाए तो वह चुनाव आयोग है। क्यों नही चुनाव आयोग पर हत्या का मामला दर्ज किया जाए! जिसके बाद चुनाव आयोग ने आखिरी के चुनाव में रैलियों पर रोक लगया दिया। साथ ही वोटों की गिनती के बाद विजय जुलूस पर भी रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया। अब सवाल उठता है कि केन्द्र सरकार एवं चुनाव आयेग को अपने देश के नागरिकों की चिंता क्यों नहीं रही? इसका जवाब तो केन्द्र सरकार एवं चुनाव आयोग से देश की जनता को मांगने का अधिकार है।                                       (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

 

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