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पश्चिम बंगाल में बंपर वोटिंग का किसे होगा फायदा

बंपर वोटिंग से उलझा राजनीतिक पंडितों का गणित

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कोलकाता (voice4bihar desk)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में शनिवार को हुए पहले चरण के मतदान में 79.79 फीसद की बंपर वोटिंग हुई। पहले चरण के मतदान में 30 सीटों के लिए 191 उम्मीदवार मैदान में थे। पहले चरण में 73 लाख से ज्यादा मतदाताओं को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना था। इनमें से 55 से 60 लाख मतदाताओं ने वोट डाले। शनिवार सुबह सात बजे से ही मतदाता वोट डालने के लिए कतार में खड़े हो गये थे। दोपहर करीब 12 बजे तक बंगाल में 36 फीसद तक मतदान हो चुका था। यह आंकड़ा शाम छह बजते-बजते 80 फीसद के आसपास पहुंच गया।

बंपर वोटिंग से उलझा राजनीतिक पंडितों का गणित

टीवी चैनलों के ओपिनियन पोल में बीजेपी और टीएमसी में कांटे की टक्कर बताई गई है। पर, बंपर वोटिंग ने राजनीतिक पंडितों के गणित को उलझा दिया है। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि बंपर वोटिंग का मतलब सत्ता में ममता बनर्जी और टीएमसी की वापसी है या यह भाजपा के पक्ष में कोई संकेत है। आमतौर पर ज्यादा वोटिंग परसेंटेज का मतलब सत्ता के खिलाफ मतदाताओं की एकजुटता समझा जाता है पर कई बार यह अंदाजा गलत साबित हो जाता है इसलिए हम अभी इस बारे में कुछ अंदाजा लगाने से बचना चाह रहे हैं।

81.92 और 83.07 फीसद वोटिंग के बाद भी बरकरार रही है सत्ता

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पश्चिम बंगाल के 2006 के विधानसभा चुनावों में 81.92 फीसद वोटिंग के बावजूद सीपीएम सत्ता में बरकरार रही थी। उस वक्त ममता मनर्जी बंगाल की राजनीति में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रहीं थीं। 2016 के विधानसभा चुनाव में भी 83.07 फीसद वोटिंग हुई और नतीजा सत्ता के पक्ष में ही रहा। यह बात दीगर है कि इस बार सत्ताधारी पार्टी टीएमसी थी और उसका नेतृत्व मनता बनर्जी की हाथों में ही था। 2011 में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। 2011 में वाम मोर्चे की 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ कर उन्होंने इस पर कब्जा जमाया।

इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले परिस्थिति थोड़ी बदली हुई है। एक साल पहले हुए लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 सीटों में से 18 जीतकर भाजपा ने ममता बनर्जी की नींद उड़ा दी। कुल 22 सीटें जीतने के बाद भी ममता बनर्जी को चैन नहीं है। इस चुनाव में वाम दल अपना खाता भी नहीं खोल सके हालांकि कांग्रेस ने दो सीटों पर कब्जा जरूर जमाया। इस बार के बंगाल चुनाव में वामदल और कांग्रेस गठबंधन के तहत चुनाव लड़ रहे हैं जबकि टीएमसी और भाजपा अपने दम पर चुनाव लड़ रही है।

2016 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी ने 294 सीटों में से 211 पर जीत हासिल की थी जबकि भाजपा को महज तीन सीटों से संतोष करना पड़ा था। कांग्रेस की स्थिति भाजपा से बहुत अच्छी थी और उसे 44 सीटों पर जीत मिली थी। 2016 में भी कांग्रेस वाम दलों से मिलकर चुनाव लड़ी थी और उसने 92 सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे।

हालांकि इस बार ममता का सामना मोदी और शाह की भाजपा सें हो रहा है। इसलिए वोटिंग परसेंटेज से अंदाजा लगाना मुश्किल हो रहा है। इस बार भाजपा ने ममता को हिंदुत्व विरोधी के रूप में पेश करने की कोशिश की है। अगर भाजपा का यह कार्ड चला तो उसे बंगाल की सत्ता से कोई दूर नहीं कर सकता है।

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