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सेनारी नरसंहार के लिए कोई दोषी नहीं, पटना हाईकोर्ट न सभी को बरी किया

निचली अदालत ने सुनायी थी तीन को आजीवन कारावास और 10 को मौत की सजा

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पटना (voice4bihar desk)। 90 के दशक में बिहार में हुए नरसंहारों के लिए कोई जिम्मेदार नहीं था। ऐसा ही एक और फैसला सेनारी नरसंहार के मामले में पटना हाईकोर्ट का आ गया है। पटना हाईकोर्ट के दो जजों की खंडपीठ ने 17 मार्च, 1999 को जहानाबाद के सेनारी में 34 लोगों की हत्या के लिए किसी को दोषी नहीं पाया है।

निचली अदालत ने इस नरसंहार के 17 साल बाद 10 लोगों को मौत और तीन लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी। करीब चार साल की सुनवाई के बाद पटना हाईकोर्ट के जज अश्विनी कुमार सिंह और अरविंद श्रीवास्तव की पीठ ने शुक्रवार को निचली अदालत से दोषी ठहराये गये सभी 13 लोगों को बरी कर दिया। इसके पहले भी पटना हाईकोर्ट से लक्ष्मणपुर बाथे और बथानी टोला जैसे नरसंहारों के सभी आरोपी बरी किये जा चुके हैं।

90 के दशक में बिहार में चरम पर था जातीय संघर्ष

90 के दशक में बिहार में जातीय संघर्ष चरम पर था। भूमिहार जहां अपनी जमीन बचाने के लिए लड़े रहे थे वहीं पिछड़ी जातियां उनकी जमीन पर कब्जा करने के लिए लड़ रही थीं। पिछड़ी जातियों के मन में बैठा दिया गया था कि भूमिहारों ने उनकी जमीन उनके पुरखों से हड़प ली है। इसी को लेकर दोनों पक्ष एक-दूसरे के दुश्मन बने हुए थे। एमसीसी जहां पिछड़ों को जमीन का हक पाने के नाम पर एकत्र कर रहा था वहीं भूमिहार रणवीर सेना के बैनर तले इकट्ठा हो रहे थे। दोनों संगठन एक-दूसरे के खून के प्यासे थे और आये दिन नरसंहार कर अपनी श्रेष्ठता साबित करने की होड़ मची हुई थी।

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हालांकि जहानाबाद के गांव सेनारी में इस लड़ाई की गंध नहीं पहुंची थी। गांव के 70 भूमिहार परिवार दूसरी जातियों के साथ मिलजुल कर रह रहे थे। कहा जाता है कि इस गांव के भूमिहार आसान टारगेट भी इसी वजह से बने कि गांव के सौहार्दपूर्ण माहौल के चलते उन्हें इस तरह का अंदेशा कभी था ही नहीं। ग्रामीण बताते हैं कि घटना 17 मार्च, 1999 की है। गांव में एमसीसी के हथियारबंद दस्ता के 500 से 600 गुर्गे घुस गये। उन्होंने गांव से आने-जाने वाले सभी रास्तों की मोर्चाबंदी कर दी ताकि न तो कोई भाग सके और न ही कोई उनकी मदद के लिए आ सके।

बताते है कि एमसीसी का दस्ता शाम करीब सात बजे गांव के भूमिहार टोले में घुसा और करीब 40 लोगों को खींच कर उनके घरों से बाहर निकाला। इन सभी को गांव के मठ के पास ले जाया गया और अपनी-अपनी मौत का इंतजार करने को कहा गया। इसी गांव की रहने वाली वरिष्ठ पत्रकार निम्मी शर्मा लिखतीं हैं कि महिलाओं ने जब नक्सलियों का विरोध किया तो नक्सलियों ने उनके साथ मारपीट की। पुरुषों को घरों से खींच कर ले जाने के दौरान जब महिलाओं ने कहा कि उन्हें भी ले चलो और मार दो, तब नक्सलियों ने कहा कि अगर तुम लोगों को भी मार दिया तो रोने के लिए कौन रह जाएगा। याद कौन रखेगा कि कैसा मौत दिए हैं, तुम्हारे घर वालों को।

इस नरसंहार में निम्मी शर्मा के चार चाचा सहित परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी गयी थी। वे बतातीं हैं कि नक्सलियों में से एक चबूतरे पर बैठा था और बंधक बनाये गये लोगों में से एक-एक को नक्सली उसके पास भेजते थे। चबूतरे पर बैठा शख्स उनकी गला रेत देता था और फिर पेेट चीर कर मौत की नींद सुला देता था।

एमसीसी का हथियारबंद दस्ता जब अपने मंसूबे पूरे कर वहां से चला गया इसके घंटे भर बाद पुलिस मौके पर पहुंची। 40 में से 34 लोगों की मौके पर मौत हो चुकी थी जबकि छह की सांसें चल रही थीं। घटना में जो मर गये सो तो मर गये जो अपनी किस्मत से बच गये वे दृश्य को देख मरनासन्न हो गये। इस घटना से उबरने में गांव के लोगों को सालों लग गये। घटना के 21 साल बाद आये फैसले में भी जब सेनारी के पीड़ितों को न्याय नहीं मिला तो उनका जख्म फिर हरा हो गया।

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