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क्या केवल सिस्टम जिम्मेदार है, हम नहीं!

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प्रणय राज
जब पहली लहर कमजोर पड़ी तो हम सब सड़कों पर, शादियों में, होटलों में ऐसे घूमने लगे मानो कोरोना तो खत्म ही हो गया है। सभी ने मास्क पहनना छोड़ दिया। जब सरकार कह रही थी कि वैक्सीन लगवाइए तो कई लोगों ने इस डर से नहीं लगवाया कि यह भारत में बनी है।

भारत में इन दिनों कोरोना के मामलों में गिरावट दर्ज की जा रही है। मगर हमें ये नही भूलना चाहिए की कोरोना अभी कुछ दिन पहले हमारे देश की सभी तैयारियों को ठेंगा दिखा चुका है। विशेषज्ञों की मानें तो पीक आ के चला गया अब कोरोना के मामलों में आगे और कमी आने की संभावना है। मगर एक प्रश्न जो कि आज लगभग हर किसी के मन में कौंध रहा है कि आखिर इस बीमारी ने इतनी तबाही मचाई कैसे। क्या हमारी गलती थी या सरकार की तैयारियों में कहीं चूक रह गई।

भारत में कोरोना की दूसरे लहर में कई दिन चौबीस घंटे में चार लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए। इस दौरान सरकारी आंकड़ों के अनुसार लाखों लोगों ने अपनों को खोया। कोई भी उस दर्द को तब तक नहीं महसूस कर सकता है जब तक कि उसने अपने को नहीं खोया हा। यह दर्द बांटने से भी शायद ही कम हो। मगर सवाल अब भी वही है कि कहां चूक हो गई हमसे जिसकी कीमत हमें लाखों लोगों की जानों को गवां कर चुकानी पड़ी।

सरकार ने समय रहते हेल्थ सेक्टर पर ध्यान नहीं दिया

मेरे खयाल से इस महामारी के इतने भयावह रूप लेने में जितनी सरकार की लापरवाही है उतनी ही हमारी भी है। देश ही नहीं दुनिया भर के विशेषज्ञ, हमारी सरकार और हम जानते थे कि बीमारी अभी खत्म नहीं हुई है। यह दुबारा लौट कर जरूर आएगी और बहुत जोर से आएगी। फिर भी सरकार ने तैयारी में कमी करते हुए अपना ध्यान हेल्थ सेक्टर में पर नहीं देकर बाकी कामों में लगाया। कोरोना की रफ्तार जब धीमी थी और जब मामले कम आ रहे थे तब सरकार चाहती तो नए अस्पताल खोल सकती थी और पुराने अस्पतालों को सुविधा संपन्न बना सकती थी। ताकि जब दूसरी लहर आए तो सभी पहले से ही तैयार रहें।

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देश में सबसे ज्यादा कमी ऑक्सीजन की हुई और सबसे ज्यादा मौतें भी इसी कारण से हुईं। सरकार अगर चाहती तो जो ऑक्सीजन के नए प्लांट्स आज बैठाए जा रहे हैं वे उसी वक्त बैठाये जा सकते थे। दवाइयों के उत्पादन में कमी नहीं की गयी होती तो आज देश में दवाइयों के लिए इतनी अफरातफरी भी नहीं होती। सरकार अगर चाहती तो पहली और दूसरी लहर के बीच अपनी तैयारी को पुख्ता कर लाखों लोगों की जान बचा सकती थी। मगर ऐसा करने में सरकार असमर्थ रही।

मगर हम आम जनता ने भी कोई कसर कहां छोड़ी थी। जब पहली लहर कमजोर पड़ी तो हम सब सड़कों पर, शादियों में, होटलों में ऐसे घूमने लगे मानो कोरोना तो खत्म ही हो गया है। सभी ने मास्क पहनना छोड़ दिया। जब सरकार कह रही थी कि वैक्सीन लगवाइए तो कई लोगों ने इस डर से नहीं लगवाया कि यह भारत में बनी है। लोगों को तब न भारत सरकार पर भरोसा था और न ही देश की उन कंपनियों पर जिनमें कार्यरत हजारों लोगों ने दिन-रात मेहनत कर वैक्सीन का उत्पादन किया। खैर, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फायदा। मैने कई लोगों को ये कहते सुना और ये मैं दूसरी लहर के समय की बात कर रहा हूं कि कहां है कोरोना, सब बस अफवाह है।

गलती सरकार की है तो लापरवाह हम भी हैं

ऐसे लोग बस बैठ के सरकार को कोस सकते हैं मगर अपने गिरेबान में नहीं झांकते कि गलती अगर सरकार की है तो कहीं न कहीं हमारी लापरवाहियों का भी नतीजा है कि देश में इतने लोगों ने अपने निकट संबंधियों को खोया है। यहां शौक़ बहराइची का शेर याद आता है

बर्बाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था

हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम ए गुलिस्तां क्या होगा।

ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक बीपीटी के अंतिम वर्ष के छात्र हैं।

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