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तो इसलिए है अस्पतालों में ऑक्सीजन की किल्लत

जितनी जरूरत उतनी मेडिकल ऑक्सीजन गैस का हो रहा उत्पादन, फिर भी किल्लत क्यों

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पटना (voice4bihar desk)। कोरोना काल में जिस एक अदृश्य वस्तु की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वह है ऑक्सीजन। कोरोना संक्रमण सबसे पहले फेफड़े को प्रभावित करता है। इसके चलते मरीज को सांस लेने में दिक्कत होती है। ऐसे समय में प्लांट में तैयार किया जाने वाला मेडिकल ऑक्सीजन मरीज के काम आता है। राजधानी पटना के पारस जैसे एक-दो हॉस्पीटल को छोड़ दें तो किसी अन्य सरकारी और निजी अस्पताल के पास मेडिकल ऑक्सीजन प्लांट नहीं है। सभी का सहारा मेडिकल ऑक्सीजन वाला सिलिंडर ही है।

आज एक हजार टन मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत, सामान्य काल में एक हजार टन काफी

अस्पतालों में लगने वाले प्लांट से तैयार होने वाले ऑक्सीजन के मुकाबले सिलिंडर वाली गैस महंगी होती है पर इसकी कीमत मरीजों को चुकानी होती है इसलिए अस्पतालों के लिए यह कभी मुद्दा नहीं रहा। आज जब महामारी के दौर में उपलब्ध सिलिंडर के मुकाबले मरीजों की संख्या कई गुनी अधिक हो गयी है तो मरीज बिना ऑक्सीजन के दम तोड़ रहे हैं। आज देश में रोज आठ हजार टन ऑक्सीजन गैस की जरूरत है जबकि सामान्य काल में जरूरत केवल एक हजार टन की होती है।

ऑक्सीजन गैस की नहीं, टैंकर और सिलिंडर की कमी

ऑल इंडिया इंडस्ट्री गैसेस मैन्युफैक्चरिंग एसोसियन की मानें तो देश में आज रोज आठ हजार टन ऑक्सीजन गैस का उत्पादन प्लांटों में हो रहा है। यानी जरूरत के मुकाबले उत्पादन पूरा हो रहा है फिर भी मरीज मेडिकल ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। ऑल इंडिया इंडस्ट्री गैसेस मैन्युफैक्चरिंग एसोसियन के ज्वायंट सेक्रेटरी और कोषाध्यक्ष सुनील कुमार गुप्ता ने इस बारे में एक दैनिक समाचार पत्र से बात करते हुए कहा कि समस्या गैस की नहीं इसके परिवहन के लिए क्रायोजनिक टैंकर और अस्पतालों में उपयोग किये जाने वाले सिलिंडर की है।

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क्रायोजनिक टैंकर बनाने में लग जायेंगे तीन महीने

उन्होंने बताया कि पहले रोज एक हजार टन मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत होती थी तो उसी हिसाब से टैंकर और सिलिंडर उपलब्ध थे। आज जब अचानक आठ हजार टन मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत आ पड़ी है तो उस हिसाब से ऑक्सीजन ढोने वाले क्रायोजनिक टैंकर और सिलिंडर नहीं हैं। गुप्ता बताते हैं कि मेडिकल ऑक्सीजन ढोने वाले क्रायोजनिक टैंकर को बनाने में 62 लाख रुपये का खर्च होता है जबकि इसे बनाने में तीन महीने लगते हैं। अभी अगर सौ-दो सौ क्रायोजनिक टैंकर बनाना शुरू भी किया जाये तो उपयोग में आने लायक वे तीन महीने बाद होंगे।

क्रायोजनिक टैंकर डबल लेयर कोटेड होतें हैं। इसकी बनावट खास तरह की होती है जिससे ये -183 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले मेडिकल ऑक्सीजन को स्टोर कर पाते हैं। हालांकि इसे दूसरे देशों से मंगाकर तत्काल उपयोग में लाया जा सकता है। केंद्र और कुछ राज्यों की सरकारें इस दिशा में प्रयास भी कर रहीं हैं।

थोड़ी सी भी लापरवाही पर बड़े खतरे का अंदेशा

हालांकि केवल टैंकर इस समस्या का समाधान नहीं है। क्रायोजनिक टैंकर से आयी गैस को स्टोर करने के लिए भी अस्पतालों को खास तरह के टैंक बनाने पड़ेंगे। डबल लेयर कोटेड टैंक -173 डिग्री सेल्सियस तक ठंढा ऑक्सीजन गैस को स्टोर करने में सक्षम होंगे तभी इसे स्टोर कर पायेंगे। फिर इस स्टोर किये गये गैस को 10 से 12 दिनों में खर्च भी करना होगा। थोड़ी सी भी लापरवाही होने पर बड़ा हादसा होने खतरा बना रहेगा।

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