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कोरोना की मार : रोजगार के लिए नेपाल में भटक रहे भारतीय मजदूर

मनरेगा में काम नहीं मिलने से निर्माण मजदूर के तौर पर ढूंढ़ रहे काम

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चोरी-छुपे अंतर्राष्ट्रीय बॉर्डर पार कर पहुंचते हैं विराटनगर मजदूर मंडी

राजेश कुमार शर्मा की रिपोर्ट

जोगबनी (voice4bihar news)। कोरोना संक्रमण रोकने के लिए अभी सिर्फ नाईट कर्फ्यू का ऐलान हुआ है लेकिन इतने से ही काम धंधे ठप होने लगे हैं। ऐसे में बेरोजगारी की मार झेल रहे बिहार के सीमावर्ती जिलों के भारतीय मजदूर काम की तलाश में नेपाल में भटकते नजर आ रहे हैं। रोजगार की तलाश में रोजाना भारत के मीरगंज, अमौना, चकोरवा, सोनापुर, जोगबनी, नीरपुर, बघुआ , सीमराहा सहित सीमावर्ती इलाकों के मजदूर पहुंच रहे हैं। भारत नेपाल के बीच खुली सीमा के रास्ते चाणक्या चौक, दरैया बस्ती, इस्लामपुर सहित अन्य रास्ते से आसानी से नेपाल प्रवेश कर नेपाल के विराट नगर में रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटकते मजदूरों को सुबह सुबह देखा जा सकता है।

विराट नगर भूमि प्रशासन चौक के समीप लगती है मजदूरों की मंडी

भारत-नेपाल सीमा पर मुख्य नाका नेपाल की ओर से बंद रहने के कारण खुली सीमा के रास्ते ये मजदूर सीमा से सटे विराटनगर के प्रशासन चौक पर सुबह-सुबह पहुँच जाते हैं। यहां एक प्रकार का मजदूरों का मंडी सजती है। दूरदराज से आकर अपनी बारी का इंतजार में खड़े रहते हैं। यहां बिल्डिंग ठिकेदार या अन्य मकान निर्माण करवा रहे लोग इन्हें आवश्यकतानुसार काम पर ले जाते हैं।

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भारतीय क्षेत्रों में नहीं मिल रहा काम, नेपाल जा रहे भारतीय मजदूर

कोरोना काल को लेकर जहां भारतीय क्षेत्रों में कई तरह से गाइड लाइन जारी किया गया है। वहीं भारतीय क्षेत्रों में मकान निर्माण कार्य सहित अन्य निर्माण कार्य नहीं के बराबर हो रहा है। ऐसे में भारतीय मजदूर चोरी छिपे सीमा पार कर नेपाल के विराटनगर सहित अन्य इलाकों में रोजगार की तलाश में रोजाना निकल पड़ते हैं।

नेपाल के विराटनगर में लेबर चौराहे पर खड़े भारतीय मजदूर।

अब मनरेगा में भी नहीं मिलता सौ दिनों का रोजगार!

मजदूरों की मानें तो अब इनके जिले में अब मनरेगा योजना के मजदूरों को सौ दिन का रोजगार नहीं मिलता। ऐसे में कार्य करने को मिलता तो मजदूर नेपाल की रूख नहीं करते। साथ ही जिस तरह आज मशीनीकरण का बोलबाला है। उससे भी मजदूरों में बेरोजगारी की समस्या बढ़ी है। जहां पूर्व एक मकान के छत को ढालने में एक सौ से डेढ़ सौ मजदूरों की आवश्यकता होती थी, आज महज दस से पंद्रह मजदूरों व मशीन से काम पूरा कर लिया जाता है।

पहले जहां एक ट्रैक्टर पर चार पांच मजदूरों की आवश्यकता होती थी, आज मात्र चालक ही काफी है जेसीबी मशीन से चंद मिनटों में ट्रेक्टर के टेलर को सामग्री से भर दिया जाता है। मनरेगा के अंतर्गत सड़क, नाला निर्माण होने वाले कार्य में भी मशीनों के उपयोग से आज मजदूरों में बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न होने लगी है जिससे भारतीय मजदूर दूसरे राज्यों तथा पड़ोसी देश नेपाल की रूख रोजी रोटी की तलाश में जाने को मजबूर है। इन्हें बस पेट की चिन्ता है इन्हें ना तो कोरोना का डर सता रहा है और ना ही सरकार की ओर से जारी कोविड गाइडलाइन का।

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